कम्पोस्ट खाद का महत्त्व
कम्पोस्ट खाद का महत्त्व
हमारी पारम्परिक खेती में कचरा, गोबर, जानवरों का मलमूत्र व अन्य वनस्पतिजन्य कचरे को एकत्रित करके खाद बनाने की प्रथा प्रचलित थी, जिसमें पौधे के लिये आवश्यक सभी पोषक तत्व तथा मिट्टी में जैविक पदार्थों का विघटन करने वाले सभी प्रकार के सूक्ष्मजीव प्रचुर मात्रा में होते थे। इस प्रकार जैविक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति का विकास होता था एवं मिट्टी अधिक समय तक अच्छी फसल देने में सक्षम रहती थी। खाद बनाने का कच्चा माल सभी किसानों के खेत में ही उपलब्ध होने के कारण उसे बनाने में विशेष खर्च नहीं होता था। जैविक खाद फसल और मिट्टी दोनों के लिये लाभकारी है, यह समझते हुए आजकल किसान खाद बनाने व खेती में उसका उपयोग करने के प्रति उदासीन हैं
केंचुआ खाद की विशेषताएँ : इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।
इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।
केंचुआ खाद की विशेषताएँ : इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।
- इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
- प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
- केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक




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